सगीता ने बनायी मुर्गाें की फौज Part 1 ! Hindi Murga Punishment Stories

सगीता ने बनायी मुर्गाें की फौज

संगीता को एक अजीब शौक था। उसको मुर्गा बनाने में बढ़ा मजा आता। स्कूल टाइम से लेकर कालेज टाइम तक उसने अपने कई लड़कों के साथ लड़कियों को तो मुर्गा बनाया ही था। साथ ही एक दो टीचरों को वह अपनी अंगुलियों पर नचा चुकी थी। घर वाले उसकी शादी के लिए लड़का ढूंढ रहे थे। जिस लड़के को घरवालों ने पसन्द किया उसका नाम सुभाष था और वो एमबीए कर चुका था तथा एक अच्छी कम्पनी में जाॅब पर था। पहली ही नजर में उसे संगीता भा गयी। छह फीट 2 इंच लम्बी कसरती बदन की संगीता की सुराहीदार गर्दन के साथ छातियों का उभार सुभाष को बेकरार कर रहा था। उसकी बहने इन्दु और बिन्दु भी बहुत खुश थी। भाई राकेश भी खुश था कि उसको भाभी मिल रही है। मां सुहासिनी एवं पिता राजेश जोकि अभी भरे हुए शरीर के मालिक थे। वह दोनों भी बहुत खुश थे। लेकिन संगीता रिश्ते से खुश नहीं थी।

अकेले कमरे में दोनों को एक दूसरे से बात करने के लिए छोड़ दिया गया। सुभाष ने उससे पूछा आपको क्या पसन्द है और आप क्या करती हैं। तपाक से संगीता ने कहा मैं बिगड़े दिमागों को अपने स्कूल में ठीक करती हूं। अच्छा आप टीचिंग करती हैं। हां फिर तो आपने किसी को कभी पनीश किया है। हां बहुतों को। संगीता ने कहा। मैं तो तुमको भी भी किसी स्टूडेंट की तरह जिंदगी भर अपना मुर्गा बनाकर रख सकती हूं। उसको लगा कि सुभाष इस बात पर नाराज हो जायेगा और शादी से इंकार कर देगा लेकिन उसे झटका तब लगा जब अचानक से सुभाष उसके सामने मुर्गा बनकर खड़ा हो गया। संगीता को एक पल तो समझ में ही नहीं आया लेकिन जब वो समझी उसे समझ में आ गया कि ससुराल में उसका राज चलना तय है। एक मिनट में सुभाष उठ खड़ा हुआ। आप ऐसा ही पति चाहती हो। मैं कई दफा आपके स्कूल में आपको देखकर आया था। मुझको आप जैसी सख्तजान बीबी चाहिए। आप जैसे स्कूल में मुर्गा बनाती हो प्लीज मुझको भी बनाना। संगीता बोली फिर तू खड़ा कैसे हुआ तूने देखा नहीं मैं कितनी देर तक मुर्गा बनाती हूं। सुभाष फिर से मुर्गा बन गया। संगीता उसके ऊपर बैठ गयी। सुभाष की टांगे कांपने लगी। 5 मिनट में उसके भाई राकेश ने दरबाजा खट्खटाया भाई बात हो गयीं हो सब इंतजार कर रहे हैं। संगीता उठ खड़ी हुई। सुभाष ने भी अपनी सांसों को जैसे तैसे संभाला। बाहर सबने सुभाष से पूछा वो तो पहले ही अपनी टीचर बीबी के स्टाइल पर फिदा था।

शादी में कुछ दिन थे। एक दिन संगीता स्कूल में 12 के लड़कों को सजा दे रही थी तो अचानक से सुभाष वहां आ पहुंचा। संगीता के हाथ में काला रूल था। मैदान में 5 लड़के मुर्गा बने थे। जिनकी पीठ पर 3 ईंटे रखी थी। लड़कों को मुर्गा बनने का आर्डर देकर वो सुभाष को लेकर स्टाफ रूम में गयी। स्टाफ रूम खाली था। सुभाष ने कहा प्लीज टीचर जी मुझको भी सजा दीजिए न। ठीक है लेकिन यहां नही। वह सुभाष को लेकर स्कूल के एक स्टोर रूम में पहुंची तथा उसको नंगा होने को कहा। सुभाष पलक झपकते नंगा हो गया। अब चलो मुर्गा बन जाओ और जब तक मैं वापस न आऊ ऐसे ही रहना। कमरे में एक फूलों का गमला रख था। उसने सुभाष को चूतड़ ऊपर उठाने को कहा। फूलों का गमला उठाकर उसने सुभाष के चूतड़ों पर रखा। होने वाले पति का लंड तनतनाते देख उसे कुछ कुछ हो रहा था लेकिन अपने पति को नया मजा देने के लिए वह उसे सताना चाहती थी। गमला गिरना नहीं चाहिए। इतना कहकर उसने स्टोररूम का ताला लगाकर चली गयी। सुभाष को समझ में नहीं आया कि ये क्या हुआ। थोड़ी देर बाद उसके रूम की खिड़की के बाहर उसे संगीता हाथ में रूल लिये नजर आयी। बाहर संगीता पांच मुर्गाें को मैदान का राउंड लगवा रही थी तो अंदर उसका पति मुर्गा बना हुआ था। अपने होने वाले पति सुभाष को कमरे में मुर्गा बनाकर संगीता बाहर अपने स्टूडेंटों को मुर्गा परेड करा रही थी। संगीता द्वारा चलाये जा रहे रूल के मुर्गाें के चूतड़ों से टकराने की आवाज को सुनकर सुभाष अपनी किस्मत को दाद दे रहा था कि उसको जैसी बीबी चाहिए थी। वो उसे मिल रही है। उसे अपने चूतड़ों पर रखे गमले को संभालने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी। गमला नीचे गिरकर आवाज के साथ टूट सकता था। आवाज बाहर जा सकती थी। इसलिए सुभाष पूरी कोशिश कर रहा था कि गमला नीचे न गिरे। प्रत्येक 5 मिनट पर संगीता अपने छात्रों की मुर्गा परेड लेकर उसके स्टोर के पास से गुजर रही थी। 20 मिनट बाद स्कूल की छुट्टी की घंटी बज गयी। सुभाष गर्मी के चलते पसीना पसीना हो चुका था। उसे लगा कि अब संगीता आकर उसे आजाद करेगी लेकिन संगीता नहीं आयी। 40 मिनट गुजरने के बाद भी कोई हलचल नहीं थी। अब मुर्गा बने रहना सुभाष के लिए बहुत ही कठिन साबित हो रहा था। टांगों में हो रहे भीषण दर्द के चलते अचानक सुभाष के चूतड़ नीचे को आये तो गमला नीचे गिरकर टूट गया। गमला टूटते ही उसे संगीता की आवाज सुनाई दी। तुझसे सही से मुर्गा नहीं बना जाता। मैंने मुर्गा बनाया है मुर्गी नहीं। दरबाजे के बाहर कोई हलचल नहीं थी लेकिन आवाज साफ और तेज नजर आयी। वो समझ गया कि संगीता कहीं पास ही है और उस पर नजर रख रही है। फटाक से उसने अपने चूतड़ ऊपर उठाये और फिर से मुर्गा बन गया। फिर शांति छा गयी। 15 मिनट बाद उसे ताला खुलने की आवाज आयी। संगीता हाथ में लकड़ी के हैंडल में जड़े हुए आधा फिट लम्बे और 5 इंच चैड़े चमड़े का पट्टा था। सुभाष की हिम्मत नहीं हुई कि वह उठकर खड़ा हो जाये। उसकी टांगे कांप रही थी लेकिन वो सजा का मजा ले रहा था। चल मेरे मुर्गे अब घर चलने का समय हो गया है। उसने सुभाष की पीठ पर पट्टे को थपथपाते हुए कहा चल मुर्गा परेड़ करते हुए पहले तू आफिस तक चलेगा। पिछले एक घंटे से नंगा मुर्गा बने हुए सुभाष को उसने खुले में चलने का इशारा किया। फिर तेजी से हाथ को हवा में ऊर उठाकर सुभाष के बांये चूतड़ पर पट्टा दे मारा। कांपती टांगों से दोनों कानों को सख्ती से पकड़ें सुभाष आफिस की ओर चल पड़ा। रास्ते में संगीता बार बार पूरी ताकत का प्रयोग करते हुए पट्टा कभी मुर्गे के बांये तो कभी दांये चूतड़ पर मार रही थी। हर स्ट्रोक पर सुभाष अपने चूतड़ों को कभी ऊपर हवा में तो कभी नीचे ले जाता। आफिस तक 50 मीटर की दूरी मुर्गा परेड़ करते हुए पहुंचने में सुभाष की हालत खस्ता हो चुकी थी। अपनी होने वाली बीबी के अत्याचार के बाद भी उसका लंड तनतना रहा था। आफिस के गेट पर पहुंचकर उसके होश उड़ गये। वहां पर कालेज की प्रिसिंपल रश्मि और पीटी टीचर मधुलिका नंगा मुर्गा बनी हुई थी। दोनों के चूतड़ों पर संगीता द्वारा पट्टे से लगायी जा चुकी मार साफ नजर आ रहा थी। दोनों मुर्गियों के आंसुओं से आसपास की जमीन गीली नजर आ रही थी। कालेज में शांति थी। सुभाष समझ चुका था कि संगीता किस हद तक जा सकती है। ऐ मेरी मुर्गियों घर नहीं जाना है क्या। चलो उठो। दोनों को उठाकर उसने कहा कि मेरे सेडिंल गंदे हो चुके हैं चलो चाटकर साफ करो। वह मुर्गा बने सुभाष की पीठ पर चढ़कर बैठ गयी। अब उसकी मुर्गियां कालेज में जिन सेडिंलों को उसने पहन रखा था। उन सेडिंलों के तलुवों पर लगी गंदगी को चाटने लगी। बीच बीच में संगीता उनके चूतड़ों एवं कमर पर पट्टा मार रही थी। रश्मि अंदर गयी और रिवाल्विंग चेयर ले आयी। इसके बाद दोनों फिर से मुर्गा बन गयीं। रश्मि ने दोनों मुर्गाें की टांगों से लम्बी रस्सियों को बांधकर चेयर से जोड़ दिया। अब वो आफिस में गयी और घोड़ों को पहनाने वाली दो लगाम ले आयी। दोनों के मुंह में लगाम लगाकर उसने रास को सीट पर रख दिया। अब सुभाष समझ चुका था कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। चल मेरे मुर्गे तुझे भी अपने कपड़े पहनने है। उसने एक बैग को सुभाष की कमर पर फिट करके बांध दिया। इसमें वजनी पत्थर रखा था। सुभाष समझ गया कि अभी उसे और दर्द झेलना है। अब संगीता आफिस में गयी तो वहां से एक अजीब सा चाबुक लायी। लकड़े के हैंडल में कुछ स्ट्रैप जुड़ी थीं। हैंडल के आखिर में एक लोहे की कील नुकीली लगी थी। उसने कहा सुभाष तुम मेरी मुर्गियों के साथ रेस करोगे। उसने लगाम को हाथ में थामकर खींचा तो रश्मि और मधुलिका के सिर ऊपर की ओर उठ गये। मुंह से लार बहने लगी। संगीता ने अपने मुर्गारथ को चलने का इशारा किया। चेयर पर बैठी संगीता के वजन को मुर्गा नहीं खिंच पाये। संगीता ने नुकीली कील को पहले रश्मि फिर मुधुलिका के चूतड़ों में धंसा दिया। खून छलका तो उछल कर मुर्गा चल पड़े। संगीता ने चाबुक तो कभी कील का इस्तेमाल शुरू कर दिया। कभी वो सुभाष को कील चुभाती तो कभी अपनी मुर्गियों को। 50 मीटर की दूरी को बढ़ाने के लिए उसने अपने मुर्गाें को लगाम से फिल्ड़ की ओर कर दिया। गर्म तपते मैदान में तीन मुर्गा संगीता के कीलों की चुभन, चाबुक की मार के साथ मैदान का राउंड लेते हुए स्कूल गेट पर पहुंच गयी। वहां पर स्कूल के तीन टीचर आलोक सर, राजेश और वेदांत पहले से ही सजा में मुर्गा बने हुए थे। तीनों की पीठ पर वजनी पत्थर रखे थे। तीनों के चूतड़ों से खून निकल रहा था। अब संगीता ने वहां रखा वजनी पटटा उठाया और सभी मुर्गाें को एक लाइन में करके सभी पर पांच पांच प्रहार किये। गेट पर सभी के कपड़े रखे थे। उसके बाद उसने सभी को कपड़ें पहनने का इशारा किया। रश्मि मधुलिका ने पल झपकते ही अपनी साड़ी और हाईहील पहन ली तो चारों मुर्गा भी इंसान बन गये। सभी ने संगीता के पैरों को चूमा और सजा के लिए धन्यवाद दिया। सुभाष के साथ संगीता अब उसकी मंगेतर के रूप में थी। काॅफी शाॅप में सुभाष ने पूछा एक बात बताओ आपने इन सबको कैसे मुर्गा बनाया। संगीता यादों में खोती चली गयी। शेष अगले अंक में,

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