मिनाक्षी की सजा – दंडा और मुर्गा बनना


मिनाक्षी अब २९ साल की हो चुकी थी। शादी को चार साल बीत चुके थे। घर-गृहस्थी, पति राहुल और नौकरी के बीच भी उसके मन में वो पुरानी स्कूली यादें कभी-कभी आग की तरह सुलग उठतीं। खासकर वो सजाएं जो मिस रेनू शर्मा उन्हें दिया करती थीं – दंडे की जलन और मुर्गा बनकर घुटनों पर खड़े रहने का अपमान।


एक शुक्रवार की दोपहर को मिनाक्षी ने राहुल को बताया कि वो अपनी सहेली से मिलने जा रही है। लेकिन असल में वो अपनी पुरानी स्कूल “सेंट मैरी हाई स्कूल” पहुंच गई। स्कूल की पुरानी दीवारें, लंबे गलियारे और क्लासरूम नंबर १२ देखकर उसका दिल जोरों से धड़कने लगा।


वो क्लासरूम में घुस गई। बेंचें खाली थीं। मिनाक्षी अपनी पुरानी सीट पर बैठ गई और आंखें बंद कर लीं। याद आ गया वो दिन जब वो बार-बार शोर मचाती थी और मिस रेनू उसे सजा देती थीं।


तभी पीछे से मधुर लेकिन सख्त आवाज आई –  

“यहाँ क्या कर रही हो? तुम्हारी बच्ची तो दूसरी क्लास में पढ़ती है ना?”


मिनाक्षी घूमकर देखा। मिस रेनू शर्मा खड़ी थीं – उम्र ४६, लेकिन अभी भी उतनी ही कड़ी और आकर्षक। सफेद साड़ी में उनकी कमर सीधी थी।


“मिस... मैं मिनाक्षी हूं... १२वीं बी की। याद है?” मिनाक्षी ने धीरे से कहा।


मिस रेनू ने एक पल उसे घूरा, फिर होंठों पर मुस्कान आई।  

“अरे वाह! वो वाली मिनाक्षी? जो हर हफ्ते मेरे सामने रो-रोकर सजा लेती थी। आज भी याद आ गई?”


मिनाक्षी ने सर झुका लिया। गाल लाल हो गए।  

“हां मिस... बहुत याद आती है।”


मिस रेनू ने उसका कंधा पकड़ा।  

“चलो मेरे साथ।”


दोनों पुराने स्टाफ रूम के बगल वाले छोटे स्टोर रूम में चली गईं। मिस ने दरवाजा बंद कर चिटकनी लगा दी। कमरे में पुराना डेस्क, कुर्सी और दीवार पर वो लंबा बांस का दंडा टंगा हुआ था।


मिस रेनू कुर्सी पर बैठ गईं।  

“तो बताओ, क्या सजा याद आ रही है?”


मिनाक्षी की आवाज कांप रही थी, “दंडे की... और... मुर्गा बनकर खड़े रहने की...”


मिस ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो आज दोनों सजाएं मिलेंगी। कपड़े उतारो। स्कर्ट ऊपर, पैंटी नीचे। पहले मुर्गा बनो।”


मिनाक्षी ने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू हटाया, स्कर्ट कमर तक चढ़ाई और पैंटी घुटनों तक उतार दी। फिर उसने दोनों हाथ सिर के पीछे रखे, घुटनों को मोड़कर मुर्गा बन गई। उसकी नंगी गांड बाहर निकल आई।


मिस रेनू ने दंडा उठाया।  

“अच्छा मुर्गा बनी हो। अब पांच मिनट ऐसे ही खड़ी रहो। हिली तो और सजा।”


मिनाक्षी की जांघें कांप रही थीं। मुर्गा बनने की वजह से उसकी कमर और गांड पर दबाव पड़ रहा था। सिर्फ दो मिनट बाद ही उसकी जांघों में जलन और दर्द होने लगा। पसीना छूटने लगा।


“मिस... पैर दुख रहे हैं...” वो कराह उठी।


मिस रेनू ने दंडा घुमाया और पहला प्रहार किया – **चटाकkk!**


“आआआह्ह्ह!” मिनाक्षी चीख पड़ी। दंडा सीधे दोनों गांडों के बीच पड़ा। जलन इतनी तेज थी कि आंसू निकल आए।


**चटाक! चटाक! चटाक!**


चार-पांच लगातार डंडे पड़े। हर डंडे के साथ मिनाक्षी का शरीर कांप जाता। गांड पर गहरी लाल पट्टियां उभर आईं। दर्द इतना तेज था कि वो मुर्गा बनकर भी हिलने लगी।


“सीधे खड़ी रहो!” मिस ने सख्ती से कहा और फिर से मारा – **चटाकkk!**


मिनाक्षी की आंखों से आंसू बह रहे थे। गांड पर आग लगी हुई थी। हर बार दंडा पड़ने पर जैसे बिजली दौड़ जाती। सूजन तेजी से बढ़ रही थी।


पांच मिनट बाद मिस ने कहा, “अब मुर्गा छोड़ो और मेरी गोद में लेट जाओ।”


मिनाक्षी कांपते पैरों से उठी। उसकी जांघें दर्द से कांप रही थीं। वो मिस की गोद में लेट गई। नंगी गांड ऊपर थी।


अब असली सजा शुरू हुई।


**चटाक! चटाक! चटाक! चटाक!**


लगातार १५-१६ जोरदार डंडे पड़े। मिनाक्षी चीख-चीखकर रो रही थी।  

“मिस... बहुत दर्द हो रहा है... आह्ह्ह... माफ कर दीजिए...”


लेकिन मिस रुकने वाली नहीं थीं। हर डंडे के बाद वो हाथ से सूजी हुई गांड सहलातीं, फिर और जोर से मारतीं। दर्द अब असहनीय हो चुका था। मिनाक्षी के पैर हवा में लहरा रहे थे। गांड पूरी तरह लाल और सूज गई थी। जलन इतनी थी कि बैठना नामुमकिन लग रहा था।


आखिर में मिस ने दंडा रख दिया।  

“बस हो गई सजा।”


मिनाक्षी उठकर मिस रेनू के पैरों में गिर पड़ी। उसने दोनों पैरों को बार-बार चूमना शुरू किया। आंसू भरी आंखों के साथ बोली,  

“थैंक यू मिस... आपने मेरी इच्छा पूरी कर दी। बहुत-बहुत शुक्रिया... दर्द बहुत अच्छा लगा...”


मिस रेनू उसके बालों में प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं,  

“कोई बात नहीं बेटी। जब मन करे आ जाना। अगली बार और ज्यादा दंडा और लंबा मुर्गा बनवाऊंगी।”


मिनाक्षी ने पैर चूमते हुए कहा,  

“मिस... अगली बार मैं अपने पति राहुल को भी लाऊंगी। उन्हें भी स्कूल की ये सजा बहुत याद आती है। आप दोनों को साथ-साथ मुर्गा बनाकर दंडा लगाएंगी?”


मिस रेनू जोर से हंस पड़ीं।  

“जरूर। दोनों को नंगा करके बगल-बगल में मुर्गा बनाऊंगी और बारी-बारी दंडा लगाऊंगी। अब जा, लेकिन याद रखना – अगली बार बिना अंडरवियर के आना।”


मिनाक्षी ने साड़ी ठीक की। चलते वक्त उसकी चाल पूरी तरह लड़खड़ा रही थी। गांड पर इतनी जलन और सूजन थी कि हर कदम पर दर्द की लहर उठ रही थी। लेकिन उसके चेहरे पर संतोष और खुशी थी।


स्कूल से बाहर निकलकर कार में बैठते ही उसने आईने में पीछे देखा। गांड पर गहरी लाल और नीली पट्टियां बन गई थीं। वो धीरे से छूकर मुस्कुराई और फुसफुसाई,  

“राहुल को जरूर लाऊंगी... दोनों को साथ सजा मिलेगी...”


घर पहुंचकर वो बिस्तर पर पेट के बल लेट गई। दर्द अभी भी तेज था, लेकिन उसी दर्द में उसे अजीब सी तृप्ति मिल रही थी। वो सोच रही थी – अगली बार कितनी सजा मिलेगी...


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